वासा अड़ूसा के अयुर्वेदिक गुण
ID: 2330

असल में दादी-नानी के जमाने से वासा का प्रयोग सर्दी-जुकाम के इलाज के लिए घरेलू नुस्ख़ों के तौर पर सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है।

ID: 1791

आयुर्वेद में कहा जाता है कि वासा वात, पित्त और कफ को कम करने में बहुत काम आता है। इसके अलावा वासा सिरदर्द, आँखों की बीमारी, पाइल्स, मूत्र रोग जैसे अनेक बीमारियों में बहुत फायदेमंद साबित होता है

वासा रासायनिक संघटन  Chemical Composition of Vasa

अडूसा स्वर के लिए उत्तम, हृदय,कफ, पित्त, रक्तविकार, तृष्णा, श्वांस, खांसी, ज्वर, वमन,प्रमेह, कोढ़ तथा क्षय का नाश करने वाला है।   श्वसन संस्थान पर इसकी मुख्य क्रिया होती है। यह कफ को पतला कर बाहर निकालता है तथा श्वांस नलिकाओं का कम परतु स्थायी प्रसार करता है। श्वांस नलिकाओं के फ़ैल जाने से दमे के रोगी का सांस फूलना कम हो जाता है। कफ के साथ यदि रक्त भी आता हो तो वह भी बंद हो जाता है। इस प्रकार यह श्लेष्म, कास, कण्ठ्य एवं श्वांशहर है।  यह रक्तशोधक एवं रक्त स्तम्भक है, क्योंकि यह छोटी रक्त वाहिनियों को संकुचित करता है। यह प्राणदा नाड़ी को अवसादित कर रक्त भार को कुछ कम करता है। इसकी पत्तियों का लेप शोथहर,वेदनास्थापन, जन्तुघ्न तथा कुष्ठघ्न है। यह मूत्र जनन, स्वेदजनन तथा कुष्ठघ्न है। नवीन कफ रोगों की अपेक्षा इसका प्रयोग जीर्ण कफ रोगों में अधिक लाभकारी है।

अडूसा के गुण–धर्म  

अडूसा वातकारक, स्वर के लिए उत्तम, हृदय, कफ, पित्त, रक्तविकार, तृष्णा, श्वांस, खांसी, ज्वर, वमन, प्रमेह, कोढ़ तथा क्षय का नाश करने वाला है। श्वसन संस्थान पर इसकी मुख्य क्रिया होती है। यह कफ को पतला कर बाहर निकालता है तथा श्वांस नलिकाओं का कम परतु स्थायी प्रसार करता है। श्वांस नलिकाओं के फ़ैल जाने से दमे के रोगी का साँस फूलना कम हो जाता है। कफ के साथ यदि रक्त भी आता हो तो वह भी बंद हो जाता है। इस प्रकार यह श्लेष्म, कास, कण्ठ्य एवं श्वांसहर है। यह रक्तशोधक एवं रक्त स्तम्भक है। क्योंकि यह छोटी रक्त वाहिनियों को संकुचित करता है। यह प्राणदा नाड़ी को अवसादित कर रक्त भर को कुछ कम करता है। इसकी पत्तियों का लेप शोथहर, वेदनास्थापन,जन्तुघ्न तथा कुष्ठघ्न है। यह मूत्र जनन, स्वेदजनन तथा कुष्ठघ्न है। नवीन कफ रोगों की अपेक्षा इसका प्रयोग जीर्ण कफ रोगों में अधिक लाभकारी है।

अडूसा के औषधीय गुण करें एसिडिटी को सदा के दूर

 

वासा अपच, गैस्ट्रिटिस या एसिडिटी में अच्छे परिणाम देता है। यह पेट में एसिड के गठन को कम कर देता है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह गैर-अल्सर अपच, अतिसुरक्षा और जठरांत्र वाले मरीजों में हेयरी सेल ल्यूकेमिया को कम कर देता है। 

अड़ूसा का पाउडर100 ग्राम

मलेठी पाउडर 100 ग्राम

आँवला पाउडर 100 ग्राम

सभी को लेकर मिक्स कर लें ।

सेवन विधि- दिन में 2 बार 2 ग्राम वासा युक्त चुर्ण ताजे पानी से 21 दिन तक सेवन करते रहे।

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औषधीय प्रयोग गुण एवं उपचार विधि

सिर दर्द में वासा की सेवन विधि 

अडूसा के फूलों को छाया में सुखाकर महीन पीसकर 10 ग्राम चूर्ण में थोड़ा गुड़ मिलाकर चार खुराक बना लें। सिरदर्द का दौरा शुरू होते ही 1 गोली खिला दें, तत्काल लाभ होता है।

नोटः अगर आप को अड़ूसा फूल नही मिल रहे तो बाजार से अड़ूसा पत्तियां मिल जाती है। 

200 ग्राम पानी मे 2 ग्राम अड़ूसा पंतियाँ 2 ग्राम गुड़ मिलाकर उबाले जब पानी आधा रह जाए तो सेवन करे। दिन 2 बार सेवन करने से सिर दर्द में आराम आना शुरू हो जाएगा। 3 से 5 दिन उपयोग कर सकते हैं।

खांसी में वासा काढ़ा की सेवन विधि 

400 ग्राम

वासा पंतियाँ 20 ग्राम

गिलोय 10 ग्राम

म्नेके 4

छुहारे 1

अजवाइन 2 ग्राम 

सभी को तब तक उबाले जब तक 200 ग्राम न रह जाए।  100 ग्राम सुबह 100 ग्राम शाम को गर्म गर्म सेवन करे। 

लाभः पुरानी खांसी, श्वांस और क्षय रोग में बहुत फायदा होता है। 3 से 5 दिन उपयोग करे।

कफ-ज्वर में वासा की सेवन विधि 

1. हरड़, बहेड़ा, आँवला, पटोल पत्र, वासा, गिलोय, कटुकी, पीपली मूल सभी बराबर मिलाकर चुर्ण बनाएं।

1चम्मच चुर्ण 1चम्मच शहद  सेवन करने से कफ ज्वर में लाभ होता है। 

3 से 5 दिन उपयोग करे।

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2. त्रिफला, गिलोय, कटुकी, चिरायता, नीम की छाल  2-2 ग्राम तथा वासा 20 ग्राम लेकर 320 ग्राम जल में पकायें, जब चतुर्थाश शेष रह जाये तो इस क्वाथ में मधु मिलाकर 20 मिलीग्राम सुबह-शाम सेवन कराने से कामला तथा पाण्डु रोग नष्ट होता है।

मासिक धर्म में वासा की सेवन विधि 

इसके पत्ते मासिक धर्म को निंयत्रित करते है।  यदि मासिक-धर्म समय से न आता हो तो वासा पत्र 10 ग्राम, मूली व गाजर के बीज प्रत्येक 6 ग्राम, तीनों को आधा किलो पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई की मात्रा में शेष बचे तो इसे उतार लें। इस तैयार काढ़े को कुछ दिन सेवन करने से लाभ होता है।

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योनि रोग : 

अडूसा, कड़वे परवल, बच, फूलिप्रयंगु और नीम पंचाग सभी को  5-5  ग्राम लेकर अच्छी तरह से पीसकर चूर्ण बना लें।

इसी प्रकार से अमलतास के काढ़े से योनि को धोकर  चुटकी से इसी चूर्ण को रखने से योनि में से आने वाली बदबू और चिकनापन (लिबलिबापन) समाप्त हो जाता है।

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सुखी खाँसी के लिए वासा युक्त नुस्खा

 अडूसा, मुनक्का और मिश्री का 10-20 ग्राम क्वाथ दिन में तीन -चार बार पिलाने से सूखी खांसी मिटती है।

दाद खुजली में वासा की सेवन विधि 

अडूसे के 10-12 कोमल पत्र तथा 2-5 ग्राम हल्दी को एक साथ गोमूत्र से पीस कर लेप करने से खुजली व शोथ कण्डु रोग शीघ्र नष्ट होता है। इससे दाद उकवत में भी लाभ होता है।

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क्षय रोग में वासा की सेवन विधि 

अडूसे के पत्तों के 20-30 ग्राम क्वाथ में छोटी पीपल का 1 ग्राम चूर्ण बुरक कर पिलाने से जीर्ण कास, श्वांस और क्षय रोग में फायदा होता है।

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जुएं का पड़ना :

अडूसा के पत्तों से बने काढे़ से बालों को धोने से जूएं मर जाते हैं।

अडूसा के पत्तों में फल बांधकर रखा जाए तो सड़ नहीं पाता, इसके (एलकोहलिक टिंचर) को छिड़कने से मक्खी, मच्छर एवं पिप्सू आदि भाग जाते हैं। अडूसा के पत्तों से बनी खाद को खेतों में डाला जाए तो फसलों में कीड़े नहीं लगते हैं। ऊनी कपड़ों के तह में पत्तों को रखने से कपड़ों में कीड़े नहीं आते हैं। इसी तरह इसके काढे़ से बालों को धोने से बालों के जूँ मर जाते हैं।

शिरो रोग में वासा की सेवन विधि 

1. वासा की जड़ को 2 ग्राम,  200 ग्राम दूध में अच्छी प्रकार पीस-छानकर इसमें 30 ग्राम मिश्री 15 नग काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से शिरो रोग, नेत्र रोग, शूल, हिचकी, खांसी आदि विकार नष्ट होते है।

2. छाया में सूखे हुए वासा पत्रों की चाय बना कर पीने से सिर दर्द या शिरोरोग संबंधी कोई भी बाधा दूर हो जाती है। स्वाद के लिए इस चाय में थोड़ा नमक मिला सकते है।

नेत्र रोग में वासा की सेवन विधि 

इसके 2-4 ताजे पुष्पों को गर्म कर आँख पर बाँधने से आँख के गोलक की पित्तशोथ (सूजन) दूर होती है।

ज्वर में वासा क्वाथ की सेवन विधि 

किसी भी प्रकार के ज्वर में लाभदायक

कैसे बनाएं सिद्ध गिलोय काढ़ा

 6 ग्लास पानी लेकर आग पर रख दे। उसमे नीचे लिखी सामग्री डाले

★ वासा पंतियाँ 100 ग्राम

★ गिलोय हरी 100 ग्राम 

★मनाका 10 पीस 

★छुहारे 5 पीस 

★तुलसी पत्ते 50 पीस 

★एक चम्मच अजवाइन 

★1 चम्मच  सौंफ

★पपीता  पत्ते -1पीस 

★ 5 पत्ते पीपल

★2 बड़ी इलायची,

जरूरत मुताबिक गुड़ डाल सकते हैं

सभी सामग्री को तब तक उबाले जब तक आधा न रह जाए।

3 ग्लास बाकी बचा काढ़ा ठण्डा होने पर /1 ग्लास सुबह/1 दुपहरी/1 शाम को ले।यह क्रिया 3 से 10 दिन लगातार करे।

नोटः 1साल के बच्चों को 2-2,चम्मच 2-2घंटे बाद दिन भर देते रहे। 2 से 5 साल के बच्चों को 50 -50 ml दे

और लाभ और फायदा —- कोरोना,कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, यूरिक एसिड, दर्द,माइग्रेन, मसल्स दर्द wbc, जुकाम, खासी,चेचक, टाइफाइड औऱ किसी भी प्रकार की लिवर इंफेक्शन में कारगर है सिद्ध गिलोय काढ़ा।

मुखपाक में वासा की सेवन विधि 

1. यदि केवल मुख में छाले हो तो इसके 2-3 पत्तों को चबाकर उसके रस को चूसने से लाभ होता है। फोक थूक देना चाहिए।

2. इसकी लकड़ी की दातौन करने से मुख के रोग दूर हो जाते हैं।

3. वासा के 50 मिलीग्राम क्वाथ में एक चम्मच गेरू और दो चम्मच मधु मिलाकर मुख में धारण करने से मुखपाक, नाड़ीव्रण नष्ट होते हैं।

दन्त सौषिर्य में वासा की सेवन विधि 

दाढ़ या दांत में कैविटी हो जाने पर उस स्थान में इसका सत्व भर देने से आराम होता है।

दन्त पीड़ा में वासा की सेवन विधि 

वासा के पत्तों के क्वाथ से कुल्ला करने से मसूड़ों की पीड़ा मिटती है।

चेचक निवारण में वासा की सेवन विधि 

☑️ वासा 100 ग्राम

☑️ गिलोय चूर्ण 100 ग्राम

☑️  सतावरी 100 ग्राम

☑️ आंवला चूर्ण 100 ग्राम

☑️ कुटकी 100 ग्राम

☑️ छोटी हरड़ 100 ग्राम

☑️ तुलसी पाचांग-100 ग्राम 

☑️ चरायता चूर्ण 100 ग्राम

☑️ अजमायण-50 ग्राम

☑️ मलॅठी-20 ग्राम

☑️ सौंठ-20 ग्राम

☑️ काली मिर्च -10 ग्राम

सभी  चूर्ण को मिलाकर 300 ग्राम गिलोय रस में भावना दे।

सेवन विधि- दिन मे 4 बार  2-2 ग्राम  3-3 घंटे बाद लेते रहे ।

साथ मे दुध भी जरूर ले । बुखार मे  लगातार 3 दिन दवा ले । हैपेटाटस है तो 21 दिन ले / 21 दिन के बाद टेस्ट कराए।

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अपस्मार में वासा की सेवन विधि

प्रतिदिन जो रोगी दूध भात का पथ्य रखता हुआ 2-5 ग्राम वासा चूर्ण का 1 चम्मच मधु के साथ सेवन करता है, वह पुराने भंयकर अपस्मार रोग से मुक्त हो जाता है।

श्वांस रोग में वासा की सेवन विधि 

1. अडूसा, हल्दी, धनिया, गिलोय, पीपल, सौंठ तथा रींगणी के 10-20 ग्राम क्वाथ में 1 ग्राम मिर्च का चूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार पीने से सम्पूर्ण श्वांस रोग पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते है।

2. इसके छोटे पेड़ के पंचाग को छाया में सुखाकर कपड़े में छानकर नित्य 10 ग्राम मात्रा की फंकी देने से श्वांस और कफ मिटता है।

दमा में वासा की सेवन विधि 

इसके ताजे पत्तों को सुखाकर उनमे थोड़े से काले धतूरे को सूखे हुए पत्ते मिलाकर दोनों का चूर्ण (बीड़ी बनाकर पीने) धूम्रपान से जीर्णश्वांस में आश्यर्चजनक लाभ होता है।

फुफ्फस प्रदाह में वासा की सेवन विधि 

अडूसे के 8-10 पत्तों को रोगन बाबूना में घोंटकर लेप करने से फुफ्फुस प्रदाह में शांति होती है।

अस्थमा के वासा क्वाथ

6 ग्लास पानी लेकर आग पर रख दे। उसमे नीचे लिखी सामग्री डाले

🍮वासा पंतियाँ 100 ग्राम

🍮पीपल पत्ते 10 

🍮गिलोय हरी 300 ग्राम 

🍮मनाका 10 पीस 

🍮छुहारे 5 पीस 

🍮तुलसी पत्ते 50 पीस 

🍮अजवाइन  1 चम्मच  

🍮पपीता  पत्ते -1पीस 

🍮2 बड़ी इलायची

सभी सामग्री को तब तक उबाले जब तक आधा न रह जाए और 3 ग्लास बाकी बचा काढ़ा ठण्डा होने पर /1 ग्लास सुबह/1 दुपहरी/1 शाम को ले। यह क्रिया 21 से 90 दिन लगातार करे। 

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नोटः 1साल के बच्चों को 2-2,चम्मच 2-2घंटे बाद दिन भर देते रहे।

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2 से 5साल के बच्चों को 50 -50 ml दे

फायदा —- 

मोटापा, यूरिक एसिड, दर्द,माइग्रेन, मसल्स दर्द, wbc, जुकाम, खासी,चेचक, टाइफाइड औऱ किसी भी प्रकार की लिवर इंफेक्शन में कारगर है सिद्ध ग्रीन टी।

और फ़ायदे 

🥃 मात्र 2 खुराक 1लाख डेंगु sells का करता है निर्माण। लकवे रोग और बंद हिर्दय बंद बल्व में  करेगा 100% असर।

🥃 हर इंफेक्शन को जड़ से करे खत्म ।किसी बुखार में इस्तेमाल करे यह काढ़ा। आप के पैसे की होगी बचत।

🥃 हर इंफेक्शन को करे जड़ खत्म किसी भी प्रकार की लिवर इंफेक्शन में कारगर

🥃 खून की कमी होगी दूर।

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ID: 1825

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ID: 1788

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